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जयपुर में महाशिवरात्रि 2027

शनिवार, 6 मार्च 2027 · Chaturdashi

📅 Jaipur में इस दिन का समय

गणना हो रही है…

Jaipur के अक्षांश/देशांतर से गणना — IST नहीं

जयपुर, राजस्थान में महाशिवरात्रि 2027 शनिवार, 6 मार्च 2027 को मनाया जाएगा। भारत के भीतर भी जयपुर का सूर्योदय दिल्ली से थोड़ा अलग है, इसलिए निशिता काल पूजा, चौघड़िया और राहु काल के समय एक सामान्य अखिल-भारतीय पंचांग से कुछ मिनट अलग पड़ते हैं। इस पेज पर नीचे दिया गया हर समय जयपुर के अनुसार गणना किया गया है।

जयपुर में महाशिवरात्रि शहर के प्राचीन मंदिरों को चमकती हुई तीर्थ स्थलों में बदल देती है, जहाँ भक्त रातभर गोविंद देव जी मंदिर और पड़ोस के कम ज्ञात मंदिरों में गुलाब और नीले रेशम से सजे हुए, पंक्तियों में खड़े होते हैं। मार्च की शाम की हवा में अगरबत्ती और दूध की भेंटों की सुगंध फैलती है, जबकि स्थानीय लोग नीले और क्रीम रंग में सजे हुए, उन पंडालों के बीच चलते हैं जहाँ पुजारी संस्कृत श्लोकों का जाप करते हैं और गली के विक्रेता जागरण करने वाले तीर्थयात्रियों को गर्म दूध में भिगोई हुई रबड़ी बेचते हैं। चांदपोल बाजार के आसपास के गुलाबी धुली हुई सड़कें एक लगभग मूर्त शांति से भर जाती हैं इस रात, जयपुर की आमतौर पर हलचल भरी लय में एक दुर्लभ विराम जहाँ शहर के प्रसिद्ध बाजार भी भक्ति में अपना सिर झुकाते प्रतीत होते हैं।

महाशिवरात्रि का महत्व

महाशिवरात्रि हिंदू पंचांग के फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, यह वह पावन रात्रि है जब भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था और जब शिव ने तांडव नृत्य कर सृष्टि को नई ऊर्जा प्रदान की थी। मान्यता है कि इसी रात शिवलिंग के रूप में ज्योतिर्मय स्तंभ प्रकट हुआ था, जिसका आदि और अंत ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं खोज पाए थे। यही कारण है कि यह तिथि शिव-भक्ति की दृष्टि से वर्ष की सबसे श्रेष्ठ रात्रि मानी जाती है।

शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि की रात्रि "निशीथ काल", अर्थात मध्यरात्रि का वह क्षण, सर्वोच्च है, जब भगवान शिव स्वयं पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। चार प्रहरों में विभाजित इस रात्रि में प्रत्येक प्रहर का अपना विशेष महत्त्व है और प्रत्येक पूजा में शिव के एक भिन्न स्वरूप की आराधना की जाती है।

महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और जागरण का महापर्व है। "शिव" का अर्थ ही है, जो कल्याणकारी है। इस रात जागकर, उपवास रखकर और निष्ठापूर्वक पूजा करके भक्त तमस (अज्ञान) को जीतकर चेतना के प्रकाश में प्रवेश करते हैं। यही इस महापर्व की आत्मा है।

शुभ मुहूर्त — और Jaipur में समय अलग क्यों

महाशिवरात्रि का मुहूर्त फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आधारित होता है। रात्रि को चार प्रहरों में बाँटा जाता है, प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ प्रहर, और इनमें से निशीथ काल (तृतीय प्रहर, मध्यरात्रि) को सर्वोत्तम माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार निशीथ काल की अवधि में किया गया शिव-पूजन सर्वाधिक फलदायी होता है। प्रत्येक प्रहर की सटीक अवधि उस दिन की स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय के समय से गणना करके निकाली जाती है, इसलिए यह समय हर स्थान के लिए भिन्न होता है।

यही कारण है कि भारतीय मानक समय (IST) पर आधारित कोई एक निश्चित समय विदेश में रहने वाले भक्तों के लिए सही नहीं होता, लंदन, दुबई, सिंगापुर या टोरंटो में सूर्यास्त और मध्यरात्रि का समय सर्वथा भिन्न है। प्रामाणिक पूजा के लिए आवश्यक है कि आप जिस स्थान पर हों, वहाँ की स्थानीय सूर्यास्त के आधार पर चारों प्रहर और निशीथ काल की गणना की जाए। सही स्थानीय मुहूर्त इसी पृष्ठ पर ऊपर दिया गया है।

महाशिवरात्रि की रीति-रिवाज

महाशिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहरों में की जाती है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक और विशेष सामग्री से पूजन किया जाता है। परिवार प्रायः निम्नलिखित चरणों में यह पर्व मनाते हैं:

  • उपवास और संकल्प: चतुर्दशी तिथि के प्रारम्भ से ही भक्त निर्जला या फलाहारी व्रत रखते हैं और पूजा से पूर्व संकल्प लेते हैं।
  • शिवलिंग अभिषेक: रात्रि के चारों प्रहरों में जल, दूध, दही, घी, शहद और गन्ने के रस से शिवलिंग का पंचामृत अभिषेक किया जाता है, यह क्रिया सबसे केंद्रीय और पवित्र है।
  • बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पण: तीन पत्तियों वाला बेलपत्र, धतूरे के फूल, आक और भांग शिव को अत्यंत प्रिय हैं; इन्हें श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है।
  • धूप, दीप और नैवेद्य: प्रत्येक प्रहर की पूजा में चंदन, धूप, दीपक जलाए जाते हैं और मिठाई व फल का भोग लगाया जाता है।
  • शिव मंत्र जाप: "ॐ नमः शिवाय" का जाप, शिव चालीसा, और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ रात भर निरंतर चलता रहता है।
  • निशीथ काल पूजा: मध्यरात्रि का यह क्षण सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; इस समय की गई पूजा का फल अन्य सभी प्रहरों से अधिक बताया गया है।
  • पारण (व्रत समापन): अगले दिन प्रातः प्रदोष काल के बाद और चतुर्दशी तिथि समाप्त होने पर उचित मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्रत में क्या खाया जा सकता है?

महाशिवरात्रि के व्रत में फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, मखाना और कुट्टू से बनी चीज़ें खाई जा सकती हैं; अनाज, नमक और तामसिक भोजन वर्जित है।

क्या महाशिवरात्रि पर रात भर जागना अनिवार्य है?

जागरण इस पर्व का अभिन्न अंग माना जाता है क्योंकि यह तमस (आलस्य और अज्ञान) पर विजय का प्रतीक है; चारों प्रहर पूजा करने वाले भक्त जागकर ही पूजन करते हैं, परंतु शारीरिक असमर्थता में आस्था और ध्यान से पूजा करना भी मान्य है।

शिवलिंग पर कौन-सी चीज़ें नहीं चढ़ानी चाहिए?

तुलसी, केतकी के फूल, नारियल पानी (कुछ मतों में) और टूटे हुए चावल शिवलिंग पर वर्जित माने जाते हैं; हल्दी भी शिवलिंग पर नहीं चढ़ाई जाती, हालाँकि शिव की मूर्ति-पूजा में परंपराएँ भिन्न हो सकती हैं।

पारण किस समय करना चाहिए?

व्रत का पारण अगले दिन प्रातःकाल चतुर्दशी तिथि समाप्त होने के बाद और प्रदोष काल से पहले करना शुभ माना जाता है; सटीक पारण समय स्थानीय पंचांग के अनुसार देखना चाहिए।

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