महाशिवरात्रि हिंदू पंचांग के फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, यह वह पावन रात्रि है जब भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था और जब शिव ने तांडव नृत्य कर सृष्टि को नई ऊर्जा प्रदान की थी। मान्यता है कि इसी रात शिवलिंग के रूप में ज्योतिर्मय स्तंभ प्रकट हुआ था, जिसका आदि और अंत ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं खोज पाए थे। यही कारण है कि यह तिथि शिव-भक्ति की दृष्टि से वर्ष की सबसे श्रेष्ठ रात्रि मानी जाती है।
शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि की रात्रि "निशीथ काल", अर्थात मध्यरात्रि का वह क्षण, सर्वोच्च है, जब भगवान शिव स्वयं पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। चार प्रहरों में विभाजित इस रात्रि में प्रत्येक प्रहर का अपना विशेष महत्त्व है और प्रत्येक पूजा में शिव के एक भिन्न स्वरूप की आराधना की जाती है।
महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और जागरण का महापर्व है। "शिव" का अर्थ ही है, जो कल्याणकारी है। इस रात जागकर, उपवास रखकर और निष्ठापूर्वक पूजा करके भक्त तमस (अज्ञान) को जीतकर चेतना के प्रकाश में प्रवेश करते हैं। यही इस महापर्व की आत्मा है।