होलिका दहन हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की रात मनाया जाने वाला पवित्र अग्नि-उत्सव है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की, अहंकार पर भक्ति की और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इसी रात जलाई गई होलिका की अग्नि में समाज अपने भीतर की नकारात्मकता और पापों को भस्म करने की भावना से आहुति देता है।
पुराणों के अनुसार, दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका, जिसे अग्नि से अभय का वरदान प्राप्त था, को आदेश दिया कि वह भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर धधकती चिता में बैठे। किंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका स्वयं उस अग्नि में भस्म हो गई। तभी से यह दहन "असत्य के नाश" और "सच्ची आस्था की रक्षा" के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के एक साथ आने का, पुराने वैर भुलाने का और नए उत्साह के साथ जीवन आरंभ करने का अवसर भी है। अगले दिन खेला जाने वाला रंगों का पर्व होली इसी पवित्र अग्नि की ऊर्जा से जन्म लेता है।