🎨 🇮🇳 Rameswaram, India

रामेश्वरम में होली 2027

मंगलवार, 23 मार्च 2027 · Pratipada

📅 Rameswaram में इस दिन का समय

गणना हो रही है…

Rameswaram के अक्षांश/देशांतर से गणना — IST नहीं

रामेश्वरम, तमिलनाडु में होली 2027 मंगलवार, 23 मार्च 2027 को मनाया जाएगा। भारत के भीतर भी रामेश्वरम का सूर्योदय दिल्ली से थोड़ा अलग है, इसलिए होलिका दहन मुहूर्त, चौघड़िया और राहु काल के समय एक सामान्य अखिल-भारतीय पंचांग से कुछ मिनट अलग पड़ते हैं। इस पेज पर नीचे दिया गया हर समय रामेश्वरम के अनुसार गणना किया गया है।

रामेश्वरम में होली का पर्व इस तीर्थ नगर को रंगों की बाढ़ से डुबा देता है, जहाँ भक्त प्राचीन रामनाथस्वामी मंदिर के हज़ार खंभों वाले गलियारों में रंगों को बिखेरते हैं और आनंद से चिल्लाते हैं, मानो स्वयं भगवान राम की पदध्वनियाँ सुनाई दें। समुद्र तट पर रहने वाली मछली पकड़ने वाली समुदाय की महिलाएँ खीर और गुझिया तैयार करती हैं जबकि बच्चे होली के चिन्हों से सजी नावों के बीच दौड़ते हैं, इस पवित्र प्रायद्वीप की खारी हवा को उत्सव की मिठास से भर देते हैं।

होली का महत्व

होली हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा और उसके अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को मनाया जाने वाला रंगों और उल्लास का महापर्व है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और भगवान विष्णु की कृपा से अहंकारी होलिका का दहन हुआ, और इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।

अगले दिन धुलंडी (रंगवाली होली) मनाई जाती है, जब लोग एक-दूसरे पर गुलाल, अबीर और रंग डालकर प्रेम, सौहार्द और नवजीवन का स्वागत करते हैं। यह पर्व शिशिर ऋतु की विदाई और वसंत के आगमन का उत्सव भी है, प्रकृति जब नई कोंपलों और फूलों से सज उठती है, तब मनुष्य भी रंगों में डूबकर उसी आनंद को व्यक्त करता है।

होली केवल एक सामाजिक उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि का अवसर भी है। होलिका की अग्नि में पुरानी कटुता, अहंकार और नकारात्मकता को जलाकर मन को नया करने की भावना इस पर्व के केंद्र में है। यही कारण है कि होली को "प्रेम और एकता का त्योहार" कहा जाता है।

शुभ मुहूर्त — और Rameswaram में समय अलग क्यों

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त निर्धारित करने में दो बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं, प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का लगभग ढाई घंटे का शुभ समय) और भद्रा का परिहार। शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल में होलिका दहन करना अशुभ माना जाता है, इसलिए दहन सदा भद्रा की समाप्ति के पश्चात ही किया जाता है। यदि भद्रा प्रदोष काल से पहले समाप्त हो जाए तो प्रदोष में दहन होता है, और यदि भद्रा मध्यरात्रि के बाद तक हो, तो प्रदोष काल में भद्रा-पुच्छ (अंतिम चरण) में विशेष परिस्थितियों में दहन का विधान है। पूर्णिमा तिथि का होलिका दहन के समय विद्यमान रहना आवश्यक है।

यही कारण है कि होलिका दहन का सटीक समय हर स्थान पर अलग होता है। मुहूर्त की गणना स्थानीय सूर्यास्त के समय पर आधारित होती है, जो अक्षांश (latitude) और देशांतर (longitude) के अनुसार बदलती है। इसीलिए भारत के किसी एक शहर का IST समय विदेश में या यहाँ तक कि दूर के दूसरे शहर के लिए भी सही नहीं होता, सटीक मुहूर्त जानने के लिए आपके स्थान की स्थानीय गणना आवश्यक है।

होली की रीति-रिवाज

होली के दो मुख्य चरण होते हैं, पहली रात्रि का होलिका दहन और दूसरे दिन की रंगवाली होली। परिवार इन अनुष्ठानों को पीढ़ियों से इस प्रकार करते आए हैं:

  • होलिका स्थापना: पूर्णिमा से कुछ दिन पहले किसी खुले सार्वजनिक स्थान पर लकड़ी, उपले और सूखी झाड़ियाँ एकत्र कर होलिका की प्रतीकात्मक संरचना बनाई जाती है।
  • पूजन और परिक्रमा: होलिका दहन के पूर्व महिलाएँ और परिवारजन कच्चे सूत (मौली), रोली, फूल, कच्चे नारियल और गेहूँ की बाली लेकर होलिका की परिक्रमा करते हैं और मंगल-कामना करते हैं।
  • होलिका दहन: शुभ मुहूर्त में, प्रदोष काल में, भद्रा-रहित समय पर, होलिका में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यह अग्नि बुराई के दहन और सत्य की विजय का प्रतीक है।
  • अग्नि में आहुति: नई फसल के अन्न (गेहूँ, जौ, चना) और नारियल को होलिका की अग्नि में अर्पित किया जाता है, यह कृतज्ञता और समृद्धि की प्रार्थना है।
  • होली की राख (भस्म) का प्रसाद: अगले दिन सुबह होलिका की ठंडी राख को माथे पर लगाना शुभ माना जाता है, यह पवित्रता और रक्षा का प्रतीक है।
  • धुलंडी, रंगों का उत्सव: प्रतिपदा के दिन सुबह से लोग एक-दूसरे पर प्राकृतिक गुलाल, अबीर और रंग लगाते हैं। बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है और गले मिलकर शुभकामनाएँ दी जाती हैं।
  • पारंपरिक पकवान: होली पर गुजिया, ठंडाई, मालपुआ, दही-भल्ले और पापड़ जैसे विशेष व्यंजन बनाए और बाँटे जाते हैं, जो उत्सव की मिठास को और बढ़ाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होलिका दहन और होली (धुलंडी) में क्या अंतर है?

होलिका दहन पूर्णिमा की रात्रि को अग्नि प्रज्वलित कर बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीकात्मक अनुष्ठान है, जबकि धुलंडी (रंगवाली होली) उसके अगले दिन प्रतिपदा को रंगों, गुलाल और आनंद के साथ मनाई जाती है।

होलिका दहन में भद्रा से क्यों बचना चाहिए?

शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल अशुभ कार्यों का समय माना जाता है और इसमें किया गया होलिका दहन हानिकारक फल दे सकता है; इसीलिए दहन सदा भद्रा की समाप्ति के बाद शुभ मुहूर्त में किया जाता है।

क्या होली पर केवल रासायनिक रंगों का उपयोग करना चाहिए?

नहीं, परंपरागत रूप से टेसू (पलाश) के फूलों, हल्दी, चंदन और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से बने गुलाल और रंग उपयोग किए जाते थे; ये त्वचा और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाते।

होलिका दहन की अग्नि की राख का क्या महत्व है?

होलिका की राख को पवित्र भस्म माना जाता है; इसे माथे पर लगाने से नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और घर में सुख-समृद्धि आती है, यह परंपरा भस्म के आध्यात्मिक शुद्धिकरण के गुण पर आधारित है।

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